GKC emblem and logoGlobal Kayastha ConferenceUniting Kayasthas Worldwide
Shri Rajeev Ranjan Prasad
Shri Rajeev Ranjan Prasad
Global President
Smt. Ragini Ranjan
Smt. Ragini Ranjan
Managing Trustee
Maj Gen Anuj Mathur
Maj Gen Anuj Mathur
Global President, Ex-Armed Forces
Shri Deepak Abhishek
Shri Deepak Abhishek
Global Vice President
Shri Navin Kumar
Shri Navin Kumar
National General Secretary
Dr. Vivek Khare
Dr. Vivek Khare
CTO & State VP, Karnataka
Ms Sapna Verma
Ms Sapna Verma
National President, Women Cell
मूल आधारCore Values
सेवाService
सहयोगCollaboration
संप्रेषणCommunication
सरलताSimplicity
समन्वयCoordination
सकारात्मकताPositivity
संवेदनशीलताSensitivity
मुखपृष्ठ / कायस्थ समाज
Kayastha · Kayasth · कायस्थ

कायस्थ समाज: चित्रगुप्तवंशी कायस्थ

श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज — इतिहास, परंपरा और समाज

कायस्थ (अंग्रेज़ी में Kayastha, Kayasth या Kayasta) भारत का एक हिंदू समाज है, जो इतिहास में लेखक, अभिलेख-पालक, विद्वान और प्रशासक के रूप में जाना जाता है। उत्तर भारत के अधिकतर कायस्थ स्वयं को चित्रगुप्तवंशी या चित्रांश कहते हैं — अर्थात श्री चित्रगुप्त जी महाराज के वंशज। आज कायस्थ समाज भारत के हर राज्य में और दुनिया के अनेक देशों में बसा है।

ग्लोबल कायस्थ कॉन्फ्रेंस (जीकेसी) एक सामाजिक संगठन है, जो राज्य इकाइयों, महिला, युवा, व्यापार आदि प्रकोष्ठों और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से देश-विदेश के कायस्थ परिवारों को जोड़ता है।

श्री चित्रगुप्त जी महाराज

सिंहासन पर विराजमान, हाथ में कलम लिए श्री चित्रगुप्त जी महाराज
श्री चित्रगुप्त जी महाराज। चित्र: TrueLinguist, Wikimedia Commons (CC0).

भगवान चित्रगुप्त वे देवता हैं जो हर मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा रखते हैं और धर्मराज यम के सहायक हैं। पुराणों के अनुसार वे ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से हाथ में कलम और दवात लिए प्रकट हुए, इसीलिए उनके वंशज “कायस्थ” कहलाए। कायस्थ उन्हें अपना कुलदेवता मानते हैं। अयोध्या, कांचीपुरम और पटना सहित कई नगरों में चित्रगुप्त मंदिर हैं — नीचे मैप लिंक के साथ चित्रगुप्त मंदिरों की सूची देखें।

श्री चित्रगुप्त मंदिर

भारत के कुछ प्रमुख चित्रगुप्त मंदिर। किसी मंदिर का रास्ता देखने के लिए “Google Maps” दबाएँ — यह हर मोबाइल फ़ोन पर मैप ऐप में खुल जाता है; आईफ़ोन पर “Apple Maps” भी चुन सकते हैं।

1

श्री चित्रगुप्त स्वामी मंदिर

📍 नेल्लुक्कार स्ट्रीट, कांचीपुरम · तमिलनाडु

भारत के सबसे प्रसिद्ध चित्रगुप्त मंदिरों में से एक; परंपरा से इसे चोल काल (लगभग नवीं शताब्दी) का माना जाता है।

2

श्री धर्महरि चित्रगुप्त मंदिर

📍 नया घाट के पास, अयोध्या · उत्तर प्रदेश

अयोध्या का प्राचीन मंदिर और कायस्थ परिवारों का तीर्थ-स्थल।

3

श्री आदि चित्रगुप्त मंदिर

📍 नौजर घाट, दीवान मोहल्ला, पटना सिटी · बिहार

गंगा तट पर स्थित पुराना मंदिर, जिसे कायस्थ धाम भी कहते हैं।

4

श्री धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर

📍 रामघाट, उज्जैन · मध्य प्रदेश

शिप्रा तट पर चित्रगुप्त जी और धर्मराज (यम) का मंदिर।

5

श्री चित्रगुप्त देवालयम्

📍 कंडीकल गेट रोड, उप्पुगुड़ा, हैदराबाद · तेलंगाना

हैदराबाद के पुराने शहर में, उप्पुगुड़ा रेलवे स्टेशन के पास पुराना मंदिर।

6

श्री चित्रगुप्त महाराज मंदिर

📍 पहाड़गंज, नई दिल्ली · दिल्ली

मध्य दिल्ली में, आर.के. आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन से पैदल दूरी पर।

7

श्री चित्रगुप्त मंदिर (के.पी.)

📍 महात्मा गांधी मार्ग, सिविल लाइंस, प्रयागराज · उत्तर प्रदेश

प्रयागराज में — वही नगर जहाँ 1873 में कायस्थ पाठशाला की स्थापना हुई।

8

चित्रगुप्त मंदिर, खजुराहो

📍 पश्चिमी मंदिर समूह, खजुराहो · मध्य प्रदेश

ग्यारहवीं शताब्दी का चंदेल मंदिर, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का भाग। नाम चित्रगुप्त होने पर भी इसकी मुख्य प्रतिमा सूर्य देव की है।

किसी और चित्रगुप्त मंदिर के बारे में जानते हैं? नाम और पता support@globalkayastha.com पर भेजें।

“कायस्थ” शब्द कितना पुराना है? संक्षिप्त इतिहास

यह शब्द मुग़ल काल से बहुत पुराना है। लगभग दो हज़ार वर्ष पुराने शिलालेखों, ताम्रपत्रों, धर्मशास्त्रों और नाटकों में कायस्थ का उल्लेख मिलता है — पहले एक पद के रूप में (राजदरबार या शासन का लेखक, लेखाकार या अभिलेख अधिकारी), और समय के साथ एक ऐसे समाज के रूप में जिसके परिवारों ने यह विद्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई।

युगों के प्रमाण

कालअभिलेख क्या बताते हैं
कुषाण काल
(लगभग दूसरी–तीसरी शताब्दी ई.)
कुषाण राजा वासुदेव प्रथम के शासनकाल का मथुरा का एक शिलालेख एक कायस्थ द्वारा रचा गया था — यह इस शब्द के सबसे पुराने ज्ञात प्रयोगों में से एक है।1
धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ)
(लगभग तीसरी–पाँचवीं शताब्दी ई.)
याज्ञवल्क्य स्मृति राजधर्म के प्रसंग में राजा से कहती है कि वह प्रजा को चोरों, ठगों और हिंसक लोगों से — और बेईमान कायस्थों (राजकीय लेखकों व लेखाकारों) से भी — बचाए। यह श्लोक प्रायः 1.336 के रूप में उद्धृत होता है। विष्णु स्मृति भी राजकीय दस्तावेज़ लिखने वाले को कायस्थ कहती है। इन ग्रंथों में यह शब्द अभी एक पद का नाम है, जाति का नहीं।2, 3
संस्कृत नाटकशूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् के नवें अंक के न्यायालय-दृश्य में एक कायस्थ न्यायाधीश के पास बैठकर गवाही लिखता है।4
गुप्त साम्राज्य
(442 ई.)
सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के एक अभिलेख में भूमि-दान को स्वीकृति देने वाले अधिकारियों में प्रथम-कायस्थ — यानी मुख्य कायस्थ या अभिलेख विभाग के प्रमुख — का नाम है।1
छठी शताब्दी का आरंभराजा वैन्यगुप्त के गुणाइघर (बंगाल) ताम्रपत्र में करण-कायस्थ — कानूनी दस्तावेज़ लिखने वाले — का उल्लेख है।1
सातवीं शताब्दी
(672 ई.)
उत्तर गुप्त राजा आदित्यसेन का अफ़सड़ शिलालेख एक गौड़-कायस्थ (बंगाल के कायस्थ) ने लिखा — इससे पता चलता है कि कायस्थों की पहचान उनके क्षेत्र से भी होने लगी थी।5
मध्यकालीन राज्य
(8वीं–12वीं शताब्दी)
उत्तर, पूर्व और मध्य भारत के अनेक राज्यों के अभिलेखों में कायस्थ परिवार वंशानुगत लेखक, मंत्री और राजकवि के रूप में मिलते हैं। इस समय तक यह शब्द स्पष्ट रूप से एक समाज का नाम बन चुका था, केवल एक पद का नहीं।5
सल्तनत और मुग़ल कालकायस्थों ने शासन की भाषा फ़ारसी सीखी और मुंशी, राजस्व अधिकारी, लेखाकार और मंत्री के रूप में सेवा की। इसी लंबी सेवा के कारण इस समाज को अक्सर मुग़ल दरबार से जोड़ा जाता है — पर “कायस्थ” शब्द उससे एक हज़ार वर्ष से भी अधिक पुराना है।
अंग्रेज़ी शासन के न्यायालय
(1860–1920 के दशक)
हिंदू विधि के अंतर्गत उत्तराधिकार और दत्तक-ग्रहण के मुक़दमों में न्यायाधीशों के बीच कायस्थों के वर्ण पर बहस हुई। अलग-अलग न्यायालयों ने अलग-अलग निर्णय दिए: कुछ ने कायस्थों को द्विज क्षत्रिय माना; कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 1884 में (राज कुमार लाल बनाम बिशेश्वर दयाल) बंगाली कायस्थों को द्विज नहीं माना; 1926 में पटना उच्च न्यायालय (ईश्वरी प्रसाद बनाम राय हरि प्रसाद लाल) ने इसके विपरीत निर्णय दिया कि कायस्थ शूद्र नहीं, द्विज हैं। किसी एक निर्णय ने सभी क्षेत्रों के लिए यह प्रश्न अंतिम रूप से तय नहीं किया।6, 9
समाज-सुधार
(1873 से)
समाज ने शिक्षा और सुधार के लिए स्वयं को संगठित किया। 1873 में इलाहाबाद (प्रयागराज) में मुंशी काली प्रसाद “कुलभास्कर” ने कायस्थ पाठशाला की स्थापना की, जिससे बने विद्यालय और महाविद्यालय आज भी विद्यार्थियों की सेवा कर रहे हैं; और अनेक प्रांतों की कायस्थ सभाएँ कायस्थ कॉन्फ्रेंस में एकजुट हुईं।7

सरल शब्दों में: कायस्थ पहचान भारतीय शासन के सबसे पुराने कार्यों में से एक — लिखित अभिलेख रखने — से विकसित हुई, और भारतीय स्रोतों में इसे डेढ़ हज़ार वर्षों से भी अधिक पीछे तक देखा जा सकता है।

संदर्भ

पुस्तकों के नाम उनकी मूल (अंग्रेज़ी/संस्कृत) भाषा में दिए गए हैं।

  1. आर.सी. मजूमदार (सं.), The History and Culture of the Indian People, खंड 2–3 (The Age of Imperial Unity; The Classical Age), भारतीय विद्या भवन — कुषाण और गुप्त प्रशासन व अभिलेख।
  2. याज्ञवल्क्य स्मृति, आचाराध्याय, राजधर्म प्रकरण, श्लोक 1.336। अनुवाद: श्रीश चंद्र विद्यार्णव, Yajnavalkya Smriti (Sacred Books of the Hindus), इलाहाबाद, 1918।
  3. विष्णु स्मृति, अध्याय 7 (लिखित दस्तावेज़); अनुवाद: जूलियस जॉली, Sacred Books of the East, खंड 7 (ऑक्सफ़ोर्ड, 1880)।
  4. शूद्रक, मृच्छकटिकम् (The Little Clay Cart), नवाँ अंक (न्यायालय-दृश्य); अनुवाद: आर्थर डब्ल्यू. राइडर (Harvard Oriental Series, 1905)।
  5. बी.पी. मजूमदार, Socio-Economic History of Northern India (1030–1194 A.D.), कलकत्ता, 1960 — आरंभिक मध्यकालीन अभिलेखों में कायस्थ, अफ़सड़ शिलालेख सहित।
  6. हेडेन जे. बेलेनॉइट, “Legal Limbo and Caste Consternation: Determining Kayasthas’ Varna Rank in Indian Law Courts, 1860–1930,” Law and History Review 41(1), 2023, पृ. 1–21. doi:10.1017/S0738248023000056।
  7. लूसी कैरोल (स्टाउट), The Hindustani Kayasthas: The Kayastha Pathshala and the Kayastha Conference, 1873–1914 (पीएच.डी. शोध-प्रबंध, शिकागो विश्वविद्यालय)।
  8. सिंथिया टैलबट, Precolonial India in Practice: Society, Region, and Identity in Medieval Andhra, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2001; पी.वी. परब्रह्म शास्त्री, The Kākatiyas of Warangal, आंध्र प्रदेश सरकार, 1978 — कायस्थ सेनानायक गंगय साहिणी और अम्बदेव।
  9. ईश्वरी प्रसाद व अन्य बनाम राय हरि प्रसाद लाल, पटना उच्च न्यायालय, 23 फ़रवरी 1926 (106 Ind Cas 620), न्यायमूर्ति ज्वाला प्रसाद और बकनिल — इसमें तुलसी राम बनाम बिहारी लाल (ILR 12 All 328) और जनेऊ पर जे.सी. नेसफ़ील्ड का भी उल्लेख है।

चित्रगुप्त पूजा और कलम-दवात पूजा

घर पर चित्रगुप्त पूजा: फूल, दीपक, कलम और काग़ज़ के साथ चित्रगुप्त जी का चित्र
घर पर कलम-दवात पूजा। फ़ोटो: Sattvic7, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

चित्रगुप्त पूजा (जिसे कलम-दवात पूजा भी कहते हैं) यम द्वितीया को मनाई जाती है — कार्तिक शुक्ल द्वितीया, भाई दूज का दिन, दीपावली के दो दिन बाद। इस दिन परिवार कलम, दवात और बही-खातों की पूजा करते हैं, वर्ष भर की आय-व्यय लिखते हैं, चित्रगुप्त कथा और आरती करते हैं, तथा विद्या और ईमानदार कर्म के लिए प्रार्थना करते हैं। कई परिवार इसे चित्रगुप्त जयंती भी कहते हैं।

जीकेसी की इकाइयाँ हर वर्ष चित्रगुप्त पूजा और सामाजिक मिलन आयोजित करती हैं। इन्हें जीकेसी कार्यक्रम कैलेंडर पर देखें।

चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की 12 उपजातियाँ

परंपरा के अनुसार श्री चित्रगुप्त जी के बारह पुत्र थे, और चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की बारह उपजातियाँ अपनी उत्पत्ति उन्हीं से मानती हैं। हर उपजाति का नाम एक प्रचलित उपनाम (सरनेम) भी है।

उपजातिEnglishअन्य वर्तनी
श्रीवास्तवSrivastavaShrivastava, Srivastav, Shrivastav
सक्सेनाSaxenaSaksena
माथुरMathur
भटनागरBhatnagar
निगमNigam
अस्थानाAsthana
कुलश्रेष्ठKulshreshthaKulshrestha
अम्बष्ठAmbashthaAmbastha, Ambasta
कर्णKarnKarna
गौड़GaurGaud
सूर्यध्वजSuryadhwaj
वाल्मीकValmikValmiki

कायस्थों के प्रचलित उपनाम

बारह उपजातियों के नामों के अलावा उत्तर भारत के कई कायस्थ परिवार सिन्हा, वर्मा, प्रसाद, सहाय, लाल, नारायण, खरे, रायज़ादा, बख़्शी, कानूनगो, शरण, स्वरूप, दयाल और बहादुर जैसे उपनाम लगाते हैं। इनमें से कई उपनाम अन्य समाजों में भी प्रचलित हैं, इसलिए केवल उपनाम से यह तय नहीं होता कि परिवार कायस्थ है।

भारत भर के कायस्थ समुदाय

बंगाली कायस्थ

बंगाल में कायस्थ समाज वहाँ के सबसे पुराने समुदायों में से है। प्रचलित उपनाम हैं — बोस (बसु), घोष, मित्र, गुहा, दत्त, दे, नाग, नंदी, पाल, सरकार और चौधरी। देखें जीकेसी पश्चिम बंगाल इकाई।

चान्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु (सीकेपी)

महाराष्ट्र में चान्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु (सीकेपी) समाज का प्रशासन और सैन्य सेवा का लंबा इतिहास है; मुंबई के पाठारे प्रभु एक संबंधित समुदाय हैं। सीकेपी उपनामों में गुप्ते, चिटणीस, कर्णिक और प्रधान शामिल हैं। देखें मुंबई, पुणे और महाराष्ट्र इकाइयाँ।

ओडिशा के करण कायस्थ, और असम

ओडिशा का करण समुदाय (पटनायक, मोहंती जैसे उपनाम) भी लेखन-परंपरा से जुड़ा है, और असम का अपना कायस्थ समाज है।

गुजरात और दक्कन

वाल्मीक कायस्थ मुख्य रूप से गुजरात में रहते हैं, और माथुर व सक्सेना परिवारों ने सदियों तक हैदराबाद सहित दक्कन के दरबारों में सेवा की (तेलंगाना इकाई)।

प्रसिद्ध कायस्थ

कायस्थों ने स्वतंत्रता आंदोलन, साहित्य और सार्वजनिक जीवन में बड़ा योगदान दिया है। सुप्रसिद्ध नामों में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद; डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा; लाल बहादुर शास्त्री; स्वामी विवेकानंद; नेताजी सुभाष चंद्र बोस; जयप्रकाश नारायण; मुंशी प्रेमचंद; और कवि हरिवंश राय बच्चन शामिल हैं।

आपके निकट कायस्थ समाज

जीकेसी की इन राज्यों और नगरों में इकाइयाँ हैं:

ग्लोबल कायस्थ कॉन्फ्रेंस के सदस्य बनें — भारत और विदेश में रहने वाले 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हर कायस्थ के लिए सदस्यता खुली है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कायस्थ कौन हैं?

कायस्थ (Kayastha, Kayasth) भारत का एक हिंदू समाज है, जो परंपरा से लेखक, अभिलेख-पालक और प्रशासक रहा है। उत्तर भारत के अधिकतर कायस्थ स्वयं को चित्रगुप्तवंशी — श्री चित्रगुप्त जी के वंशज — मानते हैं।

श्री चित्रगुप्त जी कौन हैं?

श्री चित्रगुप्त जी महाराज वे देवता हैं जो हर मनुष्य के कर्मों का लेखा रखते हैं। कायस्थ उन्हें अपना कुलदेवता मानते हैं।

चित्रगुप्त पूजा कब मनाई जाती है?

चित्रगुप्त पूजा यम द्वितीया — कार्तिक शुक्ल द्वितीया, भाई दूज के दिन, दीपावली के दो दिन बाद — मनाई जाती है। इस दिन कलम, दवात और बही-खातों की पूजा होती है (कलम-दवात पूजा)।

कायस्थों की 12 उपजातियाँ कौन-सी हैं?

चित्रगुप्तवंशी कायस्थों की बारह उपजातियाँ हैं: श्रीवास्तव, सक्सेना, माथुर, भटनागर, निगम, अस्थाना, कुलश्रेष्ठ, अम्बष्ठ, कर्ण, गौड़, सूर्यध्वज और वाल्मीक।

“कायस्थ” शब्द कितना पुराना है?

यह मुग़ल काल से बहुत पुराना है। कुषाण काल (लगभग दूसरी–तीसरी शताब्दी) का मथुरा का एक शिलालेख एक कायस्थ ने रचा था; याज्ञवल्क्य स्मृति और विष्णु स्मृति कायस्थ को राजकीय लेखक बताती हैं; और गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम के 442 ई. के अभिलेख में “प्रथम-कायस्थ” (मुख्य अभिलेख अधिकारी) का उल्लेख है।

कायस्थ क्षत्रिय हैं या शूद्र?

वर्ण व्यक्तिगत और पारिवारिक आस्था का विषय है। भारत का संविधान वर्ण-श्रेणियों को मान्यता नहीं देता, और कोई भी भारतीय क़ानून कायस्थों को किसी वर्ण में नहीं रखता। इसलिए हर कायस्थ परिवार अपनी चुनी हुई परंपरा मानने के लिए स्वतंत्र है, और जीकेसी हर कायस्थ का समान रूप से स्वागत करती है।

बहुत-से कायस्थ स्वयं को क्षत्रिय वर्ण से जोड़ते हैं, और कई ऐतिहासिक संकेत इस मत का समर्थन करते हैं:

  • आरंभ से ही उच्च पद। सबसे पुराने स्रोतों में कायस्थ एक राजकीय अधिकारी है। कुमारगुप्त प्रथम (442 ई.) के अभिलेख में “प्रथम-कायस्थ” — अभिलेख विभाग के प्रमुख — राजकीय भूमि-दान को स्वीकृति देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों में हैं; याज्ञवल्क्य स्मृति कायस्थों का उल्लेख राजधर्म के प्रसंग में करती है।1, 2
  • कलम के साथ तलवार भी। 13वीं शताब्दी के आंध्र में गंगय साहिणी और अम्बदेव जैसे कायस्थ सेनानायकों ने काकतीय राजाओं के अधीन अश्वसेना का नेतृत्व किया, दुर्गों का शासन सँभाला और क्षेत्रों पर राज किया — शासन और सैन्य कर्तव्य, जिन्हें शास्त्र क्षत्रियों से जोड़ते हैं।8
  • जनेऊ। कायस्थ लंबे समय से जनेऊ धारण करते आए हैं; 1926 में पटना उच्च न्यायालय ने नृवंशविज्ञानी जे.सी. नेसफ़ील्ड का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें “अनादि काल से” जनेऊ पहनने की मान्यता रही है।9
  • न्यायालयों के निर्णय। अंग्रेज़ी शासन में न्यायाधीश एकमत नहीं थे। 1884 में कलकत्ता उच्च न्यायालय (राज कुमार लाल बनाम बिशेश्वर दयाल) ने बंगाली कायस्थों को द्विज नहीं माना। 1890 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश (तुलसी राम बनाम बिहारी लाल) ने इस मत पर गंभीर संदेह जताया। 1926 में पटना उच्च न्यायालय (ईश्वरी प्रसाद बनाम राय हरि प्रसाद लाल) ने निर्णय दिया कि कायस्थ शूद्र नहीं, बल्कि द्विज वर्णों में हैं, और कहा कि “मूल रूप से कायस्थ क्षत्रिय हैं”।6, 9
ग्लोबल कायस्थ कॉन्फ्रेंस से कैसे जुड़ें?

18 वर्ष या उससे अधिक आयु का कायस्थ समाज का कोई भी सदस्य globalkayastha.com/membership पर ऑनलाइन जीकेसी से जुड़ सकता है और अपनी राज्य इकाई से संपर्क कर सकता है।

परंपराएँ और पारिवारिक इतिहास क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग-अलग हैं; यह पृष्ठ आम तौर पर मान्य विवरण देता है। सुधार और सुझाव support@globalkayastha.com पर भेजें।